पुलिस नहीं मार सकती किसी को गोली

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लखनउ। यूपी में कार सवार एपल कर्मचारी की पुलिसकर्मी द्वारा गोली मारकर की गई हत्या के बाद पुलिसकर्मियों के आमजन के साथ किए जाने वाले बर्ताव और बिना वजह गोली चलाने को लेकर देशभर में बहस छिड़ गई है। ऐसे में सालिटेयर एक्सप्रेस ने पुलिस ट्रेनिंग से जुड़े अहम मुद्दों और पुलिस को गोली चलाने के लिए तय सीआरपीसी नियमों की पड़ताल की। नियमों के तहत पुलिस कभी भी किसी निहत्थे पर गोली नहीं चला सकती। पुलिस को उसी सूरत में फायर करने का अधिकार है जबकि लगे कि खुद की या किसी दूसरे की जान जाने की पूरी आशंका है। लॉ एडं ऑर्डर बिगड़ने की स्थिति में भी पुलिस वार्निंग देकर ही फायर कर सकती है।
कानून व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति में हालात बेकाबू होने पर वार्निंग दी जाती है। फिर रबर की गोलियां और आंसू गैस के गोल दागे जाते हैं। लगता है कि भीड़ बेकाबू है, नजदीक है। तब जवानों की जान बचाने के लिए ही सीधी फायरिंग की जा सकती है। मगर अंधाधुंध फायरिंग नहीं।
गौतमबुद्धनगर के एडवोकेट सचिन नागर का कहना है कि फायरिंग के बाद भी यह साबित करना होता है कि अगर वह फायर नहीं करता तो उसकी या किसी अन्य की जान जा सकती थी। इसके सारे एविडेंस होने चाहिए। फायर के दौरान यह भी ध्यान रखना होता है कि उसका फायर शरीर के उस जगह पर न लगे जिससे उसकी जान जा सकती हो। निहत्थे पर पुलिस फायर नहीं कर सकती।
रिटायर्ड आरपीएस अनिल गोठवाल का कहना है कि जवान को 9 माह की इनडोर और आउटडोर ट्रेनिंग होती है। इसमें पुलिस की वर्किंग, जांच, चालान, एफआईआर दर्ज करने से लेकर एविडेंस जुटाने, सम्मन वारंट तामील कराने और फायरिंग आदि के बारे में सिखाया जाता है। आत्मरक्षा में जवान फायर कर सकता है। मगर बाद में बताना होता है कि किन परिस्थितियों के कारण उसे फायर करना पड़ा।
इनडोर ट्रेनिंग के बाद चार से पांच माह की आउटडोर ट्रेनिंग होती है। जिसमें जवानों को विभिन्न प्रकार के हथियारों को चलाना सिखाया जाता है। पहले जवानों को एसएलआर से ही ट्रेनिंग दी जाती थी मगर अब एके 47 तक को ट्रेनिंग के दौरान चलाना सिखाया जाता है।
 
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